Kalabhairav Jayanti

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काल भैरव जयंती – Kalabhairav Jayanti

काल भैरव जयंती – Kalabhairav Jayanti: भगवान शिव शंकर, भोलेनाथ, सब के भोले बाबा हैं। सृष्टि के कल्याण के लिये विष को अपने कंठ में धारण कर लेते हैं तो वहीं इनके तांडव से सृष्टि में हाहाकार भी मच जाता है और भोले बाबा विनाशक, विध्वंसक बन जाते हैं। अनेक रूपों वाले भोले भंडारी के ही अंश से पैदा हुए थे काल भैरव। मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को काल भैरव की जयंती के रूप में मनाया जाता है। इसे कालाष्टमी अथवा भैरवाष्टमी भी कहा जाता है। अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार साल 2018 में कालभैरव जयंती 29 नवंबर को मनाई जा रही है।

काल भैरव की पौराणिक कथा: Kalabhairav Jayanti ki Pauranik katha

अपने आप को श्रेष्ठ बताने के लिये अक्सर दूसरे को कमतर आंका जाने लगता है। अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने की यह लड़ाई आज से नहीं बल्कि युगों युगों से चली आ रही है। मनुष्य तो क्या देवता तक इससे न बच सकें। बहुत समय पहले की बात है। भगवान ब्रह्मा, विष्णु और महेश यानि त्रिदेवों के बीच इस बात को लेकर विवाद हो गया है कि उनमें से कौन सर्वश्रेष्ठ है। विवाद को सुलझाने के लिये समस्त देवी-देवताओं की सभा बुलाई गई। सभा ने काफी मंथन करने के पश्चात जो निष्कर्ष दिया उससे भगवान शिव और विष्णु तो सहमत हो गये लेकिन ब्रह्मा जी संतुष्ट नहीं हुए। यहां तक कि भगवान शिव को अपमानित करने का भी प्रयास किया जिससे भगवान शिव अत्यंत क्रोधित हो गये। भगवान शंकर के इस भयंकर रूप से ही काल भैरव की उत्पत्ति हुई। सभा में उपस्थित समस्त देवी देवता शिव के इस रूप को देखकर थर्राने लगे। कालभैरव जो कि काले कुत्ते पर सवार होकर हाथों में दंड लिये अवतरित हुए थे ने ब्रह्मा जी पर प्रहार कर उनके एक सिर को अलग कर दिया। ब्रह्मा जी के पास अब केवल चार शीश ही बचे उन्होंने क्षमा मांगकर काल भैरव के कोप से स्वयं को बचाया। ब्रह्मा जी के माफी मांगने पर भगवान शिव पुन: अपने रूप में आ गये लेकिन काल भैरव पर ब्रह्म हत्या का दोष चढ़ चुका था जिससे मुक्ति के लिये वे कई वर्षों तक यत्र तत्र भटकते हुए वाराणसी में पंहुचे जहां उन्हें इस पाप से मुक्ति मिली।

कुछ कथाओं में श्रेष्ठता की लड़ाई केवल ब्रह्मा जी व भगवान विष्णु के बीच भी बताई जाती है। भगवान काल भैरव को महाकालेश्वर, डंडाधिपति भी कहा जाता है। वाराणसी में दंड से मुक्ति मिलने के कारण इन्हें दंडपानी भी कहा जाता है।

काल भैरव जयंती व्रत पूजा विधिKalabhairav Jayanti Vrat Puja Vidhi

  • कालाष्टमी के दिन शिव जी के स्‍वरूप कालभैरव की पूजा करनी चाहिये। 
  • इस दिन सुबह जल्‍दी उठ कर नित्य-क्रिया खतम कर के नहा लें और हो सके तो गंगा जल से शुद्धि कर लें। 
  • व्रत का संकल्‍प लेकर पितरों को याद करें और उनका श्राद्ध करें। 
  • इसके बाद कालभैरव की पूजा करें। 
  • आधी रात में धूप, दीपक, काले तिल, उड़द और सरसों के तेल से भैरव जी की पूजा कर के आरती करें। 
  • किसी काले कुत्‍ते को व्रत खत्‍म करने के बाद मीठी रोटियां खिलाएं।

भगवान काल भैरव तंत्र विद्या के देवता भी माने जाते हैं यही कारण हैं कि तांत्रिक काल भैरव की उपासना करते हैं। मान्यता के अनुसार इनकी उपासना रात्रि में की जाती है। रात भर जागरण कर भगवान शिव, माता पार्वती एवं भगवान कालभैरव की पूजा की जाती है। काल भैरव के वाहन काले कुत्ते की भी पूजा होती है। कुत्ते को विभिन्न प्रकार के व्यंजनों का भोग लगाया जाता है। पूजा के समय काल भैरव की कथा भी सुनी या पढ़ी जाती है। अगले दिन प्रात:काल पवित्र नदी अथवा किसी तीर्थ स्थल में नहाकर श्राद्ध व तर्पण भी किया जाता है।  इसके बाद भैरव को राख अर्पित की जाती है। मान्यता है कि भैरव की पूजा करने वाला निर्भय हो जाता है। उसे किसी से भी डरने की आवश्यकता नहीं होती। उसके समस्त कष्ट बाबा भैरव हर लेते हैं।  

Kalabhairav Jayanti
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इस खास मंत्र से करें काल भैरव की पूजा: Kalabhairav Jayanti Mantra

ह्रीं उन्मत्त भैरवाय नमः॥ 

इस दिन निम्न मंत्रों को जाप करना फलदायी है।

भैरव आराधना के विशेष मंत्र
– ‘ॐ कालभैरवाय नम:।’
– ‘ ॐ भयहरणं च भैरव:।’

– ‘ॐ भ्रां कालभैरवाय फट्‍।’

– ‘ॐ ह्रीं बटुकाय आपदुद्धारणाय कुरू कुरू बटुकाय ह्रीं।’

– ‘ॐ हं षं नं गं कं सं खं महाकाल भैरवाय नम:।’
उक्त समस्त मंत्र चमत्कारिक रूप से सिद्धि प्रदान करते हैं। इनका प्रयोग अति शुद्धता से करना चाहिए। कालभैरव भगवान महादेव का अत्यंत ही रौद्र, भयाक्रांत, वीभत्स, विकराल प्रचंड स्वरूप है।

काल भैरव की पूजा से मिलते हैं ये लाभ : Kalabhairav Jayanti puja se labh

नारदपुराण के अनुसार कालभैरव की पूजा करने से मनुष्‍य की हर मनोकामना पूर्ण होती है। यदि मनुष्‍य किसी पुराने रोग से पीड़‍ि‍त है तो वह रोग, दुख और तकलीफ भी दूर हो जाएगी।

काल भैरव के मंदिर: Kalabhairav Mandir

मध्यप्रदेश के उज्जैन में महाकाल का प्रसिद्ध अति प्राचीन मंदिर तो है ही इसी मंदिर से लगभग पांच किलोमीटर की दूरी पर बाबा भैरव का भी एक प्राचीन मंदिर है जिसकी खासियत यह है कि इस मंदिर में बाबा भैरव की प्रतिमा को प्रसाद के रूप में मदिरा यानि शराब चढ़ाई जाती है जिसे बाबा ग्रहण भी करते हैं। इस मंदिर की लोकप्रियता व मान्यता भी दूर-दूर तक फैली है।

जम्मू एवं काश्मीर में स्थित माता वैष्णों देवी के मंदिर के पास ही बाबा भैरव का मंदिर भी मिलता है। इतना ही नहीं माता के अधिकांश मंदिरों के समीप बाबा भैरव का मंदिर अथवा प्रतिमा भी अवश्य मिलती हैं।

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